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ईरान-ओमान के प्लान से बदल सकता है होर्मुज का समीकरण, अमेरिका के लिए क्यों अहम?

नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्गों में शामिल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर ईरान और ओमान के बीच बातचीत तेज हो गई है। ईरान को उम्मीद है कि दोनों देश जल्द ही इस जलमार्ग के जरिए एक अस्थायी शिपिंग कॉरिडोर बनाने को लेकर समझौते पर हस्ताक्षर कर सकते हैं।

हालांकि, तेहरान ने इसके साथ एक अहम शर्त भी रखी है। ईरान का कहना है कि जब तक अमेरिका की ओर से हमले या ऐसी गतिविधियां बंद नहीं होतीं, जिन्हें वह अपने खिलाफ कार्रवाई मानता है, तब तक होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह खोलने की गारंटी नहीं दी जा सकती।

ईरान-ओमान के बीच अस्थायी कॉरिडोर पर चर्चा

ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहसिन रेजाई ने रविवार को बताया कि ईरान और ओमान के बीच होर्मुज स्ट्रेट से होकर अस्थायी समुद्री गलियारा बनाने की संभावना पर बातचीत चल रही है।

प्रस्तावित व्यवस्था के तहत इस समुद्री मार्ग का कुछ हिस्सा दोनों देशों के जलक्षेत्र से होकर गुजर सकता है। जहाजों के आवागमन को व्यवस्थित और नियंत्रित करने की जिम्मेदारी ईरान के पास रहने की बात सामने आई है।

इस पहल का मकसद रणनीतिक जलमार्ग पर कारोबारी जहाजों की आवाजाही को दोबारा शुरू करने की कोशिश करना है।

दुनिया के ऊर्जा कारोबार के लिए बेहद अहम है होर्मुज

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता है। युद्ध और मौजूदा तनाव से पहले दुनिया के कुल तेल और LNG कारोबार का करीब पांचवां हिस्सा इस मार्ग से गुजरता था।

ऐसे में इस समुद्री रास्ते पर किसी भी तरह की रुकावट का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति, शिपिंग और ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। यही वजह है कि अमेरिका समेत दुनिया के कई देश होर्मुज में समुद्री यातायात की स्थिति पर लगातार नजर रखते हैं।

अमेरिका से जुड़ी है होर्मुज खोलने की शर्त

मोहसिन रेजाई के मुताबिक, ईरान तभी होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह खुला रखने की गारंटी देने पर विचार करेगा, जब अमेरिका सैन्य हमलों और उन गतिविधियों से दूरी बनाए जिन्हें तेहरान अपने लिए खतरा मानता है।

ईरान का तर्क है कि समुद्री मार्ग को सुरक्षित रखने के लिए केवल राजनीतिक समझौता पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके पालन की ठोस गारंटी भी जरूरी है।

जून के समझौते का भी किया जिक्र

रेजाई ने अमेरिका और ईरान के बीच जून में हुई बातचीत से जुड़ी व्यवस्था का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, दोनों देशों के बीच युद्ध समाप्त करने और व्यापक समझौते की दिशा में एक फ्रेमवर्क तैयार करने की कोशिश हुई थी।

बताया गया कि प्रस्तावित व्यवस्था में अमेरिका की ओर से ईरान की नौसैनिक नाकेबंदी हटाने और ईरान की तरफ से होर्मुज से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने की बात थी।

लेकिन समझौते को लागू करने के तरीके और सुरक्षा गारंटी को लेकर दोनों पक्षों के बीच मतभेद सामने आए। ईरान का कहना है कि मध्यस्थ भी इसके क्रियान्वयन को सुनिश्चित नहीं कर पाए, जिसके कारण यह व्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकी।

ट्रंप के लिए क्यों अहम है यह घटनाक्रम?

अगर ईरान और ओमान के बीच प्रस्तावित शिपिंग कॉरिडोर पर सहमति बनती है और इसके जरिए होर्मुज में सीमित समुद्री यातायात बहाल होता है, तो यह क्षेत्रीय कूटनीति में महत्वपूर्ण घटनाक्रम होगा। दूसरी तरफ, ईरान का अमेरिका से सुरक्षा गारंटी मांगना दोनों देशों के बीच तनाव को कम करने की राह को और जटिल बना सकता है।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ईरान होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह खोलेगा या सीमित शिपिंग व्यवस्था के जरिए समुद्री कारोबार को नियंत्रित रखेगा। आने वाले दिनों में ईरान-ओमान वार्ता और अमेरिका की प्रतिक्रिया इस मामले की दिशा तय कर सकती है।

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